पद्मं पवित्रं परमं प्रकाशं ।
शुद्धं सदाऽस्तु मम जीवनम् ॥
पद्मं पवित्रं परमं प्रकाशं ।
शुद्धं सदाऽस्तु मम जीवनम् ॥
कंचन पंखुड़ियों की आभा, शाखों में झुकी शाही लय।
सूक्ष्म पुष्पों में ठहरी ऋतु, नक्शों में सजी स्वर्णिम अभय।
बूँदों का सजा अलंकार, सूक्ष्म लय में बंधा विस्तार।
एक-एक कण में ठहरी चमक, नक्शों में झलके श्रृंगार।

तीन सुरों में बँधा विन्यास, रेखाओं में संतुलित साज।
सूक्ष्मता में ठहरी भव्यता, शिल्प का त्रिविध अंदाज़।
मुकुट की उठी शाही कलगी, रेखाओं में सजा अभिमान।
एक बुट्टे में ठहरा वैभव, दरबार की मौन पहचान।
नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उवज्जायाणं नमो लोए सव्व साहूणं एसो पंच नमुक्कारो सव्व पावप्पणासणो मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं हवई मंगलं
गोविन्दं गोपिकावल्लभं वन्दे गोपालरूपिणम् ।
वेणुनादप्रियम् देवं नन्दनन्दनमाश्रये ॥





































