विघ्नहर्ता गणाध्यक्षो भक्तानामभयप्रदः ।
सर्वकार्येषु सिद्धिं च ददाति गणनायकः ॥
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं ।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ॥
शुभं लाभं च मे देहि सर्वकार्येषु सर्वदा ।
समृद्धिं सौख्यसंपत्तिं गृहं नित्यं प्रदीपय ॥

कुबेराय नमस्तुभ्यं धनधान्यप्रदायिने ।
शान्तिकलशरूपाय नमः मंगलदायिने ॥
सूक्ष्म रेखाओं में सजा वैभव, स्वर्णाभा में दरबार की छटा।
एक बुट्टे में समाई शान, शाही तेज की शांत व्याख्या।
श्वेत पंखों की कोमल आभा, राज आँगन में शांत उजाला।
हथेलियों पर ठहरी उड़ान, निरव क्षणों का स्वर्णिम हवाला।
राज आँगन की नर्म दोपहरी, पलकों में वन की हरियाली।
मृग संग हँसती राजकुमारी, निर्मल क्षणों की शाही लाली।
































