कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
गोविन्दं गोपिकावल्लभं वन्दे गोपालरूपिणम् ।
वेणुनादप्रियम् देवं नन्दनन्दनमाश्रये ॥
गोविन्दं गोपिकावल्लभं वन्दे गोपालरूपिणम् ।
वेणुनादप्रियम् देवं नन्दनन्दनमाश्रये ॥

जानकीरामं दयानिधिं धर्मसंस्थापकं विभुम् ।
भक्तवत्सलं रघुवरं वन्दे लोकनायकम् ॥
मुकुट की उठी शाही कलगी, रेखाओं में सजा अभिमान।
एक बुट्टे में ठहरा वैभव, दरबार की मौन पहचान।
कंचन पंखुड़ियों की आभा, शाखों में झुकी शाही लय।
सूक्ष्म पुष्पों में ठहरी ऋतु, नक्शों में सजी स्वर्णिम अभय।
श्वेत पंखों की कोमल आभा, राज आँगन में शांत उजाला।
हथेलियों पर ठहरी उड़ान, निरव क्षणों का स्वर्णिम हवाला।






























