मुकुट की उठी शाही कलगी, रेखाओं में सजा अभिमान।
एक बुट्टे में ठहरा वैभव, दरबार की मौन पहचान।
तीन सुरों में बँधा विन्यास, रेखाओं में संतुलित साज।
सूक्ष्मता में ठहरी भव्यता, शिल्प का त्रिविध अंदाज़।

बूँदों का सजा अलंकार, सूक्ष्म लय में बंधा विस्तार।
एक-एक कण में ठहरी चमक, नक्शों में झलके श्रृंगार।
कंचन पंखुड़ियों की आभा, शाखों में झुकी शाही लय।
सूक्ष्म पुष्पों में ठहरी ऋतु, नक्शों में सजी स्वर्णिम अभय।
पद्मं पवित्रं परमं प्रकाशं ।
शुद्धं सदाऽस्तु मम जीवनम् ॥
पद्मं पवित्रं परमं प्रकाशं ।
शुद्धं सदाऽस्तु मम जीवनम् ॥
पद्मं पवित्रं परमं प्रकाशं ।
शुद्धं सदाऽस्तु मम जीवनम् ॥
पद्मं पवित्रं परमं प्रकाशं ।
शुद्धं सदाऽस्तु मम जीवनम् ॥
































