सूक्ष्म रेखाओं में सजा वैभव, स्वर्णाभा में दरबार की छटा।
एक बुट्टे में समाई शान, शाही तेज की शांत व्याख्या।
श्वेत पंखों की कोमल आभा, राज आँगन में शांत उजाला।
हथेलियों पर ठहरी उड़ान, निरव क्षणों का स्वर्णिम हवाला।
राज आँगन की नर्म दोपहरी, पलकों में वन की हरियाली।
मृग संग हँसती राजकुमारी, निर्मल क्षणों की शाही लाली।

जानकीरामं दयानिधिं धर्मसंस्थापकं विभुम् ।
भक्तवत्सलं रघुवरं वन्दे लोकनायकम् ॥
राधारमणं देवम् वृन्दावनविहारिणम् ।
भक्तहृदयवासं कृष्णं वन्दे प्रेमरूपिणम् ॥
वेणुवाद्यप्रियं देवं गोपालं नन्दनन्दनम् ।
वेणुगोपालं वन्दे कृष्णं भक्तवत्सलम् ॥
सजधज कर चला राजगज, अम्बर में स्वर्णिम आभा।
अंबारी में बैठा गौरव, शाही शान की जीवित परिभाषा।
रघुनन्दनं रामं सीतापतिं दयानिधिम् ।
भक्तवत्सलं वीरं वन्दे लोकाभिरामम् ॥




















